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गजल



कनकनीमे ठरल पाइन इन्हेर नै भ जाइ ।
गरिबक घरमे कही कतौ भोर नै भ जाइ ।।

मुह त सिबक रखनैये छै सोसकसब,
सियल मुह फेरसं कही जोर नै भ जाइ ।

एक साँझ भुखले रहै छि मिता अखनो हम,
धियापुताक दशा देख मनकही अघोर नै भ जाइ ।

अपन बात राखैयोके स्वतन्त्रता नै देखै छी,
स्वतन्त्रताले माहुुरसन कही तिलकोर नै भ जाइ ।

ध्यान देबै यौ गौँवासब रसियाके बात पर,
मेहनतके फल फेरो कही घरक चोर नै ल जाइ ।
२०७३, २, ७

गीत



पियाजी बसै छैथ जाके बिदेश
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......


पापी पपिहा  तन मन झक्झोरै
पियाके शब्द सुनअ मन हिलकोरै
सुधि नइ देहक, भाबे नहि भेष
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......


झरिगेल आम, गुजरि रहल महुवा
सोभै नहि टिकुली , गहना नौउवा
रातिके छातीमे फाटैये कुहेश
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......


छोरु पिया छोरु धनकेर आशा
साग खायब,रहब, हृदय पास
लोग बैध पुरा करथि महेश
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......

दिनेश रसिया २०७३,२,६,5

गजल nepali

चलाई नजरैका ती बाण प्रिय खन्दै छौ मेरो चिहान प्रिय देखे मैले तिमीलाई सपनी आज गर्दै थियौ अरुसंग मुलाकात प्रिय सागरसरी चोखो माया गर्थे तिमीलाई कसरी गर्यौ तिमीले विश्वासघात प्रिय सोझो र सिधा ठानेर मलाई तिमीले मुटुभरि चोटैचोटको दियौ सौगात प्रिय कसरी बाचन सक्छु म तिमी नै भन अब चिहानसम्म पुग्दै छ मेरो बारात प्रिय दिनेश रसिया
2073/01/05

गजल Nepali



मधुकण्टाले भरिएका आवाजहरु सुनिरहन्छु म
आफनो बेग्लै एउटा संसार बुनिरहन्छु म

प्रेको अनुभुतिमा पागल ठान मलाइ तिमी
चोखो मायालुको कस्तुरी मनभरि खोजिरहन्छु म

सकुसल नै छु आज पनि तिमीले दिएको माया पाएर
केवल तस्विरलिई हातमा आजपनि   रोइरहन्छु म


सजिलो छैन बिर्सिन  तिम्रा यादहरु यो मुटुबाट
तमिीलाई भुलीदिने प्रयास जीवनभरि गरि रहन्छु म

छैन अब आशा बाकी तिम्रो फक्रिने कुनै
तै पनि निर्रथक प्रयास अझै गरिरहन्छु म

2073/01/05
दिनेश रसिया

************ गजल****************

************ गजल****************
अहाँ हमरासँ एना सदैत रुसल रहै छी किए ? कखनो देखी नै अहाँकऽ हमरा कल्पबै छी किए ? नैन ताकैत रहैए सगरो अहिँके हरदम, हमरा छोड़ि अहाँ परोछेमे रहै छी किए ? नाता जोड़ि लेने छी की दोसरसँ अहाँ, आई काल्हि हमर बात नै बुझै छी किए ? राति काटऽ दौडैए अस्गरमे बिछान पर, सपनोटामे आबिक' दर्शन नै दै छी किए ? पियासल छै "रसिया" अहाँक' एक चुरु नेह लेल, प्रेमक' मधुशाला अहाँ नै पियबै छी किए ? ************* २०७२/१२/२
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हमरबौवाके कनिया (गद्य कविताः एगो छोट प्रयास



चल गे बहिना कनिया देखैला
हे कहादैन बड निक कनिया
लौलकै य टुनटुन बौवा
कहाँदुन बिना तिलकेके
बियाह भेलौये
गै तोरा केना मालुम भेलौवे ?
mithilak ek got kharab parampara antya dish deg badha rahal (Pic: Gayatri singh)
तोरा नै बुझल छौ
कमरो बौ बराती गेल रहै
ओ त ओकरे सँगे परहै छैने
बौवा बाजैछल
जे मानदान
सेहो बड निक जका भेलै
कियाक नै हौ
कनया बर दुनु
परहले जोडी है
गै तोँ त कहै छि
मुदा तरेतरे लेने हेतै कि ?
गै सौसे दुनिया हल्ला छै
तोरा कानमे
ठेकी पर हौ
जत माछ रहै छै
ओत बिसाइने
गन्हाइत रहै छै
तोँ चुप हो आब
हमहु अपन बौवाके
वियाहमे नै लेब ढौवा
मुदा कनिया परहल लिखल
आ चिकनचुनमुन अनब
मुदा इ तिलकके ?
तिललके त झटबै
खररा–बाढैन सं ।
दिनेश रसिया २०७२–१०–२५