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।।गजल।।

।।गजल।।

आहा चलु हमहु आबै छि ।
गाबले गीत फेर गाबै छि ।।

शोर करु कतबो कानमे आहा
अपने धुनमे हम मुस्किाबै छि ।

सुतलके जगाब सम्भव छै
फुटल ढोल किए बजाबै छि ।

फुलक सोभा भग्वानपर निक
गन्हेल लहाश किये सजाबै छि ।

लातक भूत कहीं बातसे मान्लकैये
बीणपर भैँस आँहा नचाबै छि ।

हजारी पन्सैहिया परती परल छै
खोँटा सीक्का अहाँ चलाबै छि ।

देखु घर घरमे सम्शान छै एत
आहाँ मधुशालामे मौज मनाबै छि ।

दिनेश रसिया २०७३ जेष्ठ25

।। गजल ।।

     
आखर आखर जोइर जोइर क बना लिय दु पाति ।
हरियर डाइरपर बैसल सुगा गाबे नित् पराती ।।

सोहर,सम्दाउन, लग्नी झिझिया पसरल कोनेकोन,
अपन संस्कृति जोगाब मिता बाइर लिय एक बाती ।।

निरिह बनल छै समाज एत् दोसरके व्यवहारसं,
छोरु उच निचके भेद, बैन जाउ सब मैथिल जाती ।।

उपर हिमालय, निचा गंगा , कोशी कमला आ बलान
बनु अभियानी अहुँ भद्री, कारिक,लोरिकके भाती ।।

बुद्धि, विवेक, भाषा आ संस्कृति, सभ्यतामे धनिक हम
नबका चदैर पेन्हकs जग्बै खोइल कs पुरणा गाती ।।

सरल वार्णिक बहर २०,

दिनेश रसिया, लहान २०७३,२,१८

।। कजरी ।।




कोयलिया कुहु कुहु गीत सुनाबे
हमरो हिया हुलसाबे ना २
गे बहिना हिया हुलसाबै ना
पपिहरा पिया पिया कहिके जगाबे
हमरो मन तरसाबै ना
कोयलिया ......

एक त राजा बसन्तक मौसम
बहके इ मनमा ना २
दुजे बैरीन पियाके सपनमा २
आगी जरबे पवनमा ना
कोयलिया कुहु......
हमरो ......

दिन भरि काजमे थाकल देहिया
टुटै इ शरीरिया ना  २
रातिक नैना नेह निहारै २
आबै नै निन्दिया ना
कोयलया .....
हमरो ....

ब्यर्थे बितै इ हमरो जीबन
बुझियौ बिवस्ता ना २
अपने जौ परदेश रहब यौ २
कोन काजल देहिया ना
कोयलिया .....
हमरो .....

दिनेश रसिया २०७३,२, १८ लहान

गजल



कनकनीमे ठरल पाइन इन्हेर नै भ जाइ ।
गरिबक घरमे कही कतौ भोर नै भ जाइ ।।

मुह त सिबक रखनैये छै सोसकसब,
सियल मुह फेरसं कही जोर नै भ जाइ ।

एक साँझ भुखले रहै छि मिता अखनो हम,
धियापुताक दशा देख मनकही अघोर नै भ जाइ ।

अपन बात राखैयोके स्वतन्त्रता नै देखै छी,
स्वतन्त्रताले माहुुरसन कही तिलकोर नै भ जाइ ।

ध्यान देबै यौ गौँवासब रसियाके बात पर,
मेहनतके फल फेरो कही घरक चोर नै ल जाइ ।
२०७३, २, ७

गीत



पियाजी बसै छैथ जाके बिदेश
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......


पापी पपिहा  तन मन झक्झोरै
पियाके शब्द सुनअ मन हिलकोरै
सुधि नइ देहक, भाबे नहि भेष
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......


झरिगेल आम, गुजरि रहल महुवा
सोभै नहि टिकुली , गहना नौउवा
रातिके छातीमे फाटैये कुहेश
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......


छोरु पिया छोरु धनकेर आशा
साग खायब,रहब, हृदय पास
लोग बैध पुरा करथि महेश
दुर्गति कहु कोना भेजु  सनेश
पिया जीबसै छैथ ......

दिनेश रसिया २०७३,२,६,5

गजल nepali

चलाई नजरैका ती बाण प्रिय खन्दै छौ मेरो चिहान प्रिय देखे मैले तिमीलाई सपनी आज गर्दै थियौ अरुसंग मुलाकात प्रिय सागरसरी चोखो माया गर्थे तिमीलाई कसरी गर्यौ तिमीले विश्वासघात प्रिय सोझो र सिधा ठानेर मलाई तिमीले मुटुभरि चोटैचोटको दियौ सौगात प्रिय कसरी बाचन सक्छु म तिमी नै भन अब चिहानसम्म पुग्दै छ मेरो बारात प्रिय दिनेश रसिया
2073/01/05

गजल Nepali



मधुकण्टाले भरिएका आवाजहरु सुनिरहन्छु म
आफनो बेग्लै एउटा संसार बुनिरहन्छु म

प्रेको अनुभुतिमा पागल ठान मलाइ तिमी
चोखो मायालुको कस्तुरी मनभरि खोजिरहन्छु म

सकुसल नै छु आज पनि तिमीले दिएको माया पाएर
केवल तस्विरलिई हातमा आजपनि   रोइरहन्छु म


सजिलो छैन बिर्सिन  तिम्रा यादहरु यो मुटुबाट
तमिीलाई भुलीदिने प्रयास जीवनभरि गरि रहन्छु म

छैन अब आशा बाकी तिम्रो फक्रिने कुनै
तै पनि निर्रथक प्रयास अझै गरिरहन्छु म

2073/01/05
दिनेश रसिया